" अल्फ़ाज़ - ज़ो पिरोये मनसा ने "

ज़र्रों में रह गुज़र के चमक छोड़ जाऊँगा ,
आवाज़ अपनी मैं दूर तलक छोड़ जाऊँगा |
खामोशियों की नींद गंवारा नहीं मुझे ,
शीशा हूँ टूट भी गया तो खनक छोड़ जाऊँगा||

...दिल में कसक आज़ भी हैं ||




                            तेरे आलिंगन में धडकनों को मिली थी जन्नत ,
                                                               मेरी साँसो में उसकी सिसक आज भी हैं |
                            अलविदा कहते जो छूए थे तूने लब मेरे ,
                                                         मेरे होंठो पे तेरे होंठो की खिसक आज़ भी हैं ||
                            ख़्वाहिश तो थी लिखने की पूरी किताब तेरे हुस्न के जलवों पे ,
                            पर तेरी बेवफ़ाई ने मेरी कलम को उठने न दिया , 
                                                                     दिल में इसकी कसक आज़ भी हैं ||

|| मनसा ||


जरा इन्हें भी देख लीजिये  >>

...क्या मुझे प्यार का सलीका भी नहीं आया था ???



जब उसने कहा था मुझसे , मैं चाहती हूँ किसी और को ,
"तुम्हारी खुशी सबसे ऊपर है मेरे लिए" शब्द बस इत्ते ही निकाल पाया था |

लिखा था उसका नाम कमरे के हर कोने में , चूमता था हरदिन उन्हे ,
गम की उस रात , मैंने हर नाम को चूम चूम के मिटाया था ||

कल शादी थी उसकी , बुलाया नहीं था उसने , मैं गया फिर भी ,
जिन हाथों से देता था तोहफा , उन्हीं से बरातियों का सोफा सजा के आया था ||

मुझे तो गिला भी नहीं की आज उसे मैं याद भी न रहा ,
उसकी मोहब्बत में , मैं भी तो सारे जहाँ को भुला के आया था ||

उससे तो मैं बेवफाई का हिसाब माँगने क़ाबिल भी न हो सका ,
उसके इश्क़ के आगोश में , मैं भी तो कई दिल तोड़ के आया था ||

बस एक ख़याल ने उसकी मोहब्बत में ज़ान फ़ना होने से बचा ली ,
उसे शायद मिल जाए दूजा ,पर माँ को मैं बड़ी मन्नतों से मिल पाया था ||

जिनकी चाह था मैं ,उन अपनों को छोड़ भागा था मैं उस गैर के पीछे ,
लोग कहते हैं ," मनसा " तूझे तो प्यार का सलीका भी नहीं आया था ||

मैं , मेरा बचपन और मेरी माँ || (^_^) ||







ज़ब कभी मैं फुर्सत के पलों में शीशा देखता हूँ |
अपने अक्स में खिलखिलाते एक बच्चे को देखता हूँ ||

एक बच्चा , जिसने बोलना सीखा था प्रथम शब्द " माँ "
जिस शब्द को समझा पाने का किसी वर्णमाला में न दम हुआ करता था ||

एक बच्चा , जब कोशिश करता क़दम धरने की ज़मीं पे 
बार बार गिरते देख जिसकी माँ के दिल में कंपकंपी सा हुआ करता था ||

एक बच्चा , आंखो में काजल और हाथों में जिसे पकड़ाती थी माँ मुरली 
जिसमें बसते थे प्राण ,माँ के लिए ज़ो "कान्हा" का अक्स हुआ करता था ||

एक बच्चा , क़दम पहला पड़ा था ज़मीं पें ज़ब उसका 
माँ की खुशी , जैसे प्यासे को नसीब अमृतपान हुआ करता था ||

एक बच्चा , जिसे यक़ीन था मोहब्बत के अंधी होने का 
उसे देखने से पहले भी माँ को उससे प्यार ज़ो हुआ करता था ||

एक बच्चा , जिसका मज़हब था सिर्फ उसकी "माँ "
माँ ही मक्का , माँ मदीना ,माँ चारों धाम हुआ करता था ||

एक बच्चा , ज़ो चूम लेता था माँ के हर कदम को मिट्टी पें 
पर मिट्टी खाने की गलतफहमी में , ज़ो डांट का शिकार हुआ करता था ||

एक बच्चा , जिसे शहद और शक्कर कहते "हम हैं सबसे मीठे "
"तब तुमने मेरी माँ को नहीं देखा " ये जिसका जवाब हुआ करता था ||

एक बच्चा ,जिसे अता हैं शोहरत ए जिंदगी उस " माँ " की दुआओं की बदौलत ,
आज़ भी करता हूँ उस विधाता की ज़िंदा प्रतिमूर्ति ,परम शक्ति की साधना ज़ो मेरा मेहताब हुआ करता था ||

|| मनसा ||