" अल्फ़ाज़ - ज़ो पिरोये मनसा ने "

ज़र्रों में रह गुज़र के चमक छोड़ जाऊँगा ,
आवाज़ अपनी मैं दूर तलक छोड़ जाऊँगा |
खामोशियों की नींद गंवारा नहीं मुझे ,
शीशा हूँ टूट भी गया तो खनक छोड़ जाऊँगा||

'मोहब्बत' पेशा नहीं होता


  वो बेवफा आज फिर लौट आई हैं मुझमें ही सिमट जाने को |
  अरे कोई उस नादाँ को समझाए ,'मोहब्बत' पेशा नहीं होता ||



बहना को देता आशीष नज़र आऊँ :)




राखी के हर धागे का कर्ज़ मुझपे ,
कभी उससे न मुकर जाऊँ |

आज़ हूँ भले उससे दूर कितना ,
दिलों में कभी दूरी न मगर पाऊँ ||

न मिले प्रेम उसका,सुनी रहे कलाई 
कभी ऐसी मैं न सहर पाऊँ |

प्यारी बहना जो लिखी तूने नसीब में ,
ख़ुदा हर जन्म ऐसी तेरी महर पाऊँ |

खुशियाँ मिले उसे सारे जहाँ की ,
उसके चेहरे पे हरदम खुशी की लहर चाहूँ ||

कभी छू न सके कोई दर्द उसको ,
भले बदले , मैं जहन्नुम  द्वारे उतर जाऊँ ||

ऐ मौला , बस अता कर ऐसी ज़िंदगानी मुझको ,

जब भी याद करें वो मुझको ,
पास उसके मैं  देता आशीष नज़र आऊँ || 


|| मनसा ||