" अल्फ़ाज़ - ज़ो पिरोये मनसा ने "

ज़र्रों में रह गुज़र के चमक छोड़ जाऊँगा ,
आवाज़ अपनी मैं दूर तलक छोड़ जाऊँगा |
खामोशियों की नींद गंवारा नहीं मुझे ,
शीशा हूँ टूट भी गया तो खनक छोड़ जाऊँगा||

मुबारकबाद ,मेरे जन्मदिन पे



                       जाने क्यूँ दे रहे ,लोग मुबारकबाद ,मुझे मेरे जन्मदिन पे "मनसा" |
                       ये दिन तो हर दफा , मेरी हयात का एक साल वजा कर देता हैं || 


#हयात - जिंदगी
#वजा - कम करना