" अल्फ़ाज़ - ज़ो पिरोये मनसा ने "

ज़र्रों में रह गुज़र के चमक छोड़ जाऊँगा ,
आवाज़ अपनी मैं दूर तलक छोड़ जाऊँगा |
खामोशियों की नींद गंवारा नहीं मुझे ,
शीशा हूँ टूट भी गया तो खनक छोड़ जाऊँगा||

किसे जलाये - रावण को या राम को ????

   

"दशहरा"

एक विजय उत्सव 
अच्छाई पे बुराई का |
या 
एक शर्मसार दिन 
 संदेश जिसका पति से बेवफ़ाई का ||


नहीं पता मुझको 
शायद तुमको भी नहीं |
ये दिन
याद दिलाता हैं मुझे 
मिले जो 
"दर्द"
 और बस दर्द    
सीता को 
 पति से वफ़ाई पे ||


  कौन था ? 
असली गुनहगार
"रावण"
एक राक्षस होके 
जो यूं अपनी जात दिखा पाया |
 अंहकार में परस्त्री को उठा ले आया ||
या 
"राम"
जो अंतर्यामी होके भी 
अपनी पत्नी पे विश्वास न कर पाया |
 चरित्र पे शक कर वनवास छोड़ आया ||

यूं इतने दिन 
पाक चरित्र 
रख के भी 
क्या पाया उस बेचारी ने |
इस से अच्छा होता अगर 
एक रात 
रावण के संग 
सो ली होती |
तो पूरी ज़िंदगी 
रनिवासों में जी ली होती ||
पर नहीं 
नहीं 
उसे तो अपने
पति-परमेश्वर की पड़ी थी |
उन्हीं के संग 
चलने-जीने का 
संकल्प
ले चली थी || 
पर हाय रे उसकी 
फूटी किस्मत ,
उस मर्यादा पुरुषोत्तम 
ने मर्यादायों में 
घृणा के अलावा
उसे कुछ न दिया ||


अब तुम बताओ 
किसे जलाना चाहिए आज ???
उस "रावण" को 
जिसने 
एक अनजान औरत 
के 
हुस्न-प्रेम 
में अंधे होकर 
पूरी दुनिया को दुश्मन बना लिया |
मौत को खुद निमंत्रण थमा दिया ||
या 
उस "राम" को 
जिसने अपनी 
तथाकथित "सब कुछ" 
अर्धांगिनी 
को भोग-शक का शिकार बना दिया |
 पूरे जमाने में उसका परिहास बना दिया ||  

|| मनसा ||

दशहरा की हार्दिक शुभकामनायें