" अल्फ़ाज़ - ज़ो पिरोये मनसा ने "

ज़र्रों में रह गुज़र के चमक छोड़ जाऊँगा ,
आवाज़ अपनी मैं दूर तलक छोड़ जाऊँगा |
खामोशियों की नींद गंवारा नहीं मुझे ,
शीशा हूँ टूट भी गया तो खनक छोड़ जाऊँगा||

नींद से अगर किसी को मोहब्बत हो जाएँ



कितनी अजीब सी उलझन हो जाएँ
नींद से अगर किसी को मोहब्बत हो जाएँ 
रात को जब वो उससे मिलने आएँ
तो माशूका "नींद" को ,
अकेली छोड़ वो सो ना सकें  ,
और जब वो चली जायें  ,
तो 'मनसा' वो सो न पाएँ
नींद उससे मिले भी,
और नींद अधूरी भी रह जाएँ ||




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